Journal of Advances in Developmental Research
E-ISSN: 0976-4844
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Impact Factor: 9.71
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Volume 17 Issue 1
2026
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कालीबंगा सभ्यता का ऐतिहासिक अवलोकन
| Author(s) | Kamla Shanker Regar |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | कालीबंगा सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन नगरीय परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कालीबंगा स्थल सिंधु-सरस्वती सभ्यता के प्रमुख केंद्रों में से एक था, जो वर्तमान राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर नदी (प्राचीन सरस्वती से संबद्ध मानी जाने वाली धारा) के तट पर स्थित है। यह स्थल न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य कालीबंगा सभ्यता के ऐतिहासिक विकास-क्रम, सांस्कृतिक विशेषताओं, नगरीय नियोजन, कृषि-प्रणाली, धार्मिक आस्थाओं तथा पुरातात्त्विक महत्व का समग्र विश्लेषण करना है। उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि कालीबंगा में प्रारंभिक हड़प्पा (Pre-Harappan) और परिपक्व हड़प्पा (Mature Harappan) दोनों सांस्कृतिक स्तरों का क्रमिक विकास हुआ। इस प्रकार यह स्थल सभ्यता के संक्रमण काल को समझने में विशेष सहायक सिद्ध होता है। कालीबंगा की सुव्यवस्थित नगर-योजना, समकोणीय सड़क-पद्धति, प्राचीर-युक्त दुर्ग, अग्निवेदियों के अवशेष तथा हल से जोते गए खेत के प्रमाण इसे अन्य हड़प्पा स्थलों से विशिष्ट बनाते हैं। यहाँ से प्राप्त मृदभांड, मुद्राएँ, आभूषण और धातु-उपकरण उस समय की उन्नत शिल्पकला और व्यापारिक गतिविधियों का संकेत देते हैं। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि पर्यावरणीय परिवर्तन, नदी-प्रवाह में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं ने इस सभ्यता के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः कालीबंगा का ऐतिहासिक अवलोकन न केवल सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विस्तार और स्वरूप को समझने में सहायक है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय समाज की आर्थिक, धार्मिक और तकनीकी प्रगति का भी सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। परिचय कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है, जो प्राचीन सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अभिन्न अंग था। यह स्थल घग्गर नदी के शुष्क तट के निकट अवस्थित है, जिसे अनेक विद्वान वैदिक सरस्वती नदी से संबद्ध मानते हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी भारत के उन स्थलों में आता है, जहाँ प्राचीन काल में समृद्ध नगरीय जीवन का विकास हुआ। ‘कालीबंगा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—‘काले चूड़ियों का स्थान’। यह नाम स्थानीय परंपरा से जुड़ा है, क्योंकि यहाँ से काले रंग की मिट्टी की चूड़ियाँ एवं अन्य मृदभांड प्राप्त हुए थे। ये अवशेष इस क्षेत्र की प्राचीन शिल्पकला और सांस्कृतिक गतिविधियों के सशक्त प्रमाण हैं। इस स्थल की पहचान वर्ष 1953 में हुई तथा 1960 से 1969 के मध्य Archaeological Survey of India द्वारा यहाँ व्यवस्थित उत्खनन कार्य किया गया। इस उत्खनन का नेतृत्व प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बी. बी. लाल और बी. के. ठाकुर ने किया। उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों ने भारतीय प्राचीन इतिहास के अध्ययन में एक नया अध्याय जोड़ा। कालीबंगा का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहाँ प्रारंभिक हड़प्पा (Pre-Harappan) तथा परिपक्व हड़प्पा (Mature Harappan) दोनों सांस्कृतिक स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह स्थल केवल एक विकसित नगर नहीं था, बल्कि सभ्यता के क्रमिक विकास का साक्षी भी रहा। यहाँ प्राप्त दुर्ग-प्रणाली, योजनाबद्ध सड़कें, अग्निवेदियाँ तथा कृषि के प्रमाण यह दर्शाते हैं कि कालीबंगा एक संगठित, समृद्ध और उन्नत नगरीय केंद्र था। अतः कालीबंगा का अध्ययन न केवल सिंधु-सरस्वती सभ्यता की भौगोलिक सीमा को स्पष्ट करता है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय समाज की सामाजिक संरचना, आर्थिक गतिविधियों और धार्मिक आस्थाओं को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भौगोलिक स्थिति और पर्यावरणीय संदर्भ कालीबंगा घग्गर नदी के तट पर स्थित था, जिसे अनेक इतिहासकार और भू-वैज्ञानिक प्राचीन सरस्वती नदी से संबद्ध मानते हैं। प्राचीन काल में यह नदी जलसमृद्ध एवं प्रवाहमान थी, जिसके कारण इस क्षेत्र में कृषि, पशुपालन और व्यापार का पर्याप्त विकास संभव हुआ। नदी के तटीय मैदानों की उपजाऊ मिट्टी ने यहाँ की अर्थव्यवस्था को स्थिर आधार प्रदान किया। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र अर्ध-शुष्क (Semi-arid) था, जहाँ वर्षा सीमित मात्रा में होती थी। किंतु नदी की उपलब्धता और संभवतः कृत्रिम जल-संरचनाओं के कारण कृषि उत्पादन निरंतर बना रहा। उत्खनन में प्राप्त जुताई के प्रमाण—विशेषकर क्रॉस-फर्रो (आड़ी-तिरछी जुताई) वाले खेत—यह दर्शाते हैं कि यहाँ के निवासी कृषि तकनीकों से परिचित थे और योजनाबद्ध खेती करते थे। यह विश्व के प्राचीनतम कृषि-साक्ष्यों में से एक माना जाता है। पर्यावरणीय दृष्टि से कालीबंगा का विकास नदी-आधारित सभ्यता की विशेषताओं को दर्शाता है। जलवायु में परिवर्तन, नदी के प्रवाह में कमी अथवा दिशा-परिवर्तन, तथा सूखे जैसी परिस्थितियों ने इस क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक संरचना को प्रभावित किया। अनेक विद्वानों का मत है कि सरस्वती/घग्गर नदी के क्रमिक क्षीण होने से यहाँ की नगरीय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जो अंततः सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों में से एक बना। इस प्रकार कालीबंगा की भौगोलिक स्थिति ने उसके उत्कर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं पर्यावरणीय परिवर्तनों ने उसके अवसान को भी प्रभावित किया। यह स्थल इस तथ्य का उत्कृष्ट उदाहरण है कि प्राचीन सभ्यताओं का विकास और अस्तित्व प्राकृतिक संसाधनों तथा पर्यावरणीय संतुलन पर किस प्रकार निर्भर करता था। नगरीय योजना (Urban Planning) कालीबंगा की नगरीय योजना अत्यंत सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध थी, जो संपूर्ण सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं को प्रतिबिंबित करती है। यह नगर दो मुख्य भागों—ऊँचा दुर्ग क्षेत्र और निचला नगर—में विभाजित था। दुर्ग क्षेत्र कृत्रिम रूप से ऊँचे चबूतरे पर निर्मित था और उसे सुदृढ़ प्राचीरों से सुरक्षित किया गया था। इस भाग में प्रशासनिक तथा धार्मिक गतिविधियों से संबंधित संरचनाएँ स्थित थीं, जिनमें अग्निवेदियों के अवशेष विशेष उल्लेखनीय हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र नगर के शासक वर्ग या विशेष सामाजिक समूह के लिए आरक्षित रहा होगा। निचला नगर सामान्य नागरिकों का आवासीय क्षेत्र था, जिसे भी सुरक्षा की दृष्टि से प्राचीरों से घेरा गया था। नगर की सड़कों का विन्यास अत्यंत वैज्ञानिक था; वे एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जिससे ग्रिड-पद्धति का निर्माण होता था। यह योजना इस बात का प्रमाण है कि नगर का निर्माण पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार किया गया था। मुख्य मार्ग अपेक्षाकृत चौड़े थे, जबकि उनसे जुड़ी गलियाँ संकरी थीं। सड़कों के किनारे जल-निकासी की सुसंगठित व्यवस्था थी, जिससे वर्षा या घरेलू उपयोग का जल व्यवस्थित रूप से बाहर निकल सके। आवासीय संरचनाएँ कच्ची तथा पक्की ईंटों से निर्मित थीं और ईंटों का आकार मानकीकृत था, जो निर्माण तकनीक की उन्नत अवस्था को दर्शाता है। अधिकांश घरों में आँगन केंद्र में स्थित होता था, जिसके चारों ओर कमरे बने होते थे। कई घरों में निजी कुएँ तथा जल-निकासी की व्यवस्था भी पाई गई है, जो उस समय की स्वच्छता और सुविधाओं के प्रति जागरूकता को इंगित करती है। संपूर्ण नगर-योजना से स्पष्ट होता है कि कालीबंगा एक सुव्यवस्थित शहरी केंद्र था, जहाँ सामाजिक संगठन, प्रशासनिक नियंत्रण और तकनीकी दक्षता का समन्वय देखने को मिलता है। कृषि और अर्थव्यवस्था कालीबंगा की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतः कृषि और पशुपालन था, जो संपूर्ण सिंधु घाटी सभ्यता की जीवन-पद्धति के अनुरूप था। कालीबंगा से प्राप्त सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्यों में हल से जोते गए खेत का प्रमाण विशेष उल्लेखनीय है। उत्खनन के दौरान भूमि की सतह पर आड़ी-तिरछी जुताई के चिह्न मिले, जिन्हें विश्व के प्राचीनतम ज्ञात कृषि-चिह्नों में गिना जाता है। यह खोज इस तथ्य की पुष्टि करती है कि यहाँ के निवासी संगठित एवं उन्नत कृषि तकनीकों से परिचित थे और योजनाबद्ध ढंग से खेती करते थे। यहाँ गेहूँ, जौ तथा अन्य अनाजों की खेती के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। कृषि उत्पादन की स्थिरता के लिए घग्गर नदी का जल और उसकी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी अत्यंत सहायक रही होगी। इसके अतिरिक्त पशुपालन भी आर्थिक जीवन का प्रमुख अंग था। उत्खनन में प्राप्त पशु-अवशेषों से ज्ञात होता है कि गाय, बैल, भेड़, बकरी आदि पालतू पशुओं का पालन किया जाता था, जो कृषि कार्यों तथा दैनिक जीवन में उपयोगी थे। कृषि और पशुपालन के साथ-साथ कालीबंगा में शिल्प एवं व्यापारिक गतिविधियाँ भी विकसित थीं। यहाँ से प्राप्त मृदभांड (Pottery) अपनी विशिष्ट चित्रांकन शैली और ज्यामितीय अलंकरण के कारण उल्लेखनीय हैं। मनकों, चूड़ियों, ताम्र उपकरणों तथा अन्य धातु-निर्मित वस्तुओं की प्राप्ति से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ कारीगर वर्ग सक्रिय था। इन वस्तुओं की गुणवत्ता और विविधता यह संकेत देती है कि कालीबंगा का संबंध अन्य समकालीन नगरों से व्यापारिक रूप में रहा होगा। इस प्रकार कालीबंगा की अर्थव्यवस्था बहुआयामी थी, जिसमें कृषि उत्पादन, पशुपालन, शिल्पकला और व्यापार का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। यह आर्थिक संरचना उस समय की सामाजिक स्थिरता और नगरीय विकास का सुदृढ़ आधार रही होगी। धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन कालीबंगा से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्य यह संकेत करते हैं कि यहाँ का धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन सुव्यवस्थित तथा प्रतीकात्मक परंपराओं से युक्त था। उत्खनन में प्राप्त अग्निकुंडों (अग्निवेदियों) के अवशेष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये संरचनाएँ प्रायः आयताकार अथवा क्रमबद्ध रूप में निर्मित थीं और दुर्ग क्षेत्र में पाई गईं। विद्वानों के अनुसार इनका संबंध किसी प्रकार के अग्नि-पूजन या धार्मिक अनुष्ठानों से रहा होगा। इस प्रकार की सुव्यवस्थित अग्निवेदियाँ अन्य समकालीन स्थलों की अपेक्षा कालीबंगा को विशिष्ट बनाती हैं और यहाँ की धार्मिक परंपराओं की अलग पहचान प्रस्तुत करती हैं। इसके अतिरिक्त मृण्मूर्तियों (टेराकोटा प्रतिमाओं), मोहरों तथा विविध आभूषणों की प्राप्ति से इस सभ्यता के सांस्कृतिक जीवन की समृद्धि का परिचय मिलता है। मृण्मूर्तियों में मानव एवं पशु आकृतियाँ मिलती हैं, जो संभवतः लोक-आस्था, देवी-पूजा अथवा प्रतीकात्मक मान्यताओं से संबंधित रही होंगी। मोहरों पर उत्कीर्ण चिन्ह और चित्र न केवल प्रशासनिक अथवा व्यापारिक प्रयोजनों की ओर संकेत करते हैं, बल्कि उस समय की लिपि एवं कलात्मक अभिव्यक्ति का भी द्योतक हैं। आभूषणों—जैसे मनके, चूड़ियाँ और धातु निर्मित अलंकरण—से यह ज्ञात होता है कि सौंदर्य-बोध और शिल्पकला का विकास उच्च स्तर का था। स्त्री और पुरुष दोनों द्वारा आभूषणों के प्रयोग के संकेत मिलते हैं, जिससे सामाजिक जीवन में सजावट और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार कालीबंगा का धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन आध्यात्मिक आस्थाओं, प्रतीकात्मक अनुष्ठानों तथा विकसित कलात्मक अभिरुचि का समन्वित रूप प्रस्तुत करता है, जो इसे प्राचीन भारतीय सभ्यता के अध्ययन में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है। पतन के कारण कालीबंगा के पतन के विषय में विद्वानों ने विभिन्न संभावनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिनका संबंध मुख्यतः प्राकृतिक एवं पर्यावरणीय कारकों से जोड़ा जाता है। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र था, किंतु कालांतर में यहाँ की नगरीय संरचना का अवसान हो गया। पुरातात्त्विक साक्ष्य संकेत करते हैं कि यह पतन क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम था, न कि किसी एकमात्र घटना का। सबसे प्रमुख कारणों में घग्गर नदी के प्रवाह में परिवर्तन या उसके क्रमिक क्षीण होने की संभावना मानी जाती है। चूँकि कालीबंगा का आर्थिक और सामाजिक जीवन नदी पर आधारित था, अतः जल-स्रोत के समाप्त होने से कृषि और व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा। जलवायु परिवर्तन, विशेषकर क्षेत्र के अधिक शुष्क होने की प्रक्रिया, भी इस अवनति में सहायक रही होगी। वर्षा में कमी और पर्यावरणीय असंतुलन ने जीवन-यापन की परिस्थितियों को कठिन बना दिया होगा। कुछ विद्वान भूकंप की संभावना भी व्यक्त करते हैं। उत्खनन में प्राप्त कुछ संरचनात्मक विकृतियाँ इस ओर संकेत करती हैं कि किसी प्राकृतिक आपदा ने नगर की स्थिरता को प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त आर्थिक अवनति—विशेषकर व्यापारिक नेटवर्क के कमजोर पड़ने—ने भी सामाजिक संरचना को अस्थिर किया होगा। पुरातात्त्विक प्रमाण यह दर्शाते हैं कि नगर का परित्याग अचानक हुआ प्रतीत होता है, किंतु व्यापक विनाश के चिह्न नहीं मिलते। इससे अनुमान लगाया जाता है कि निवासियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण धीरे-धीरे इस क्षेत्र को छोड़ दिया। इस प्रकार कालीबंगा का पतन प्राकृतिक परिवर्तनों और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम रहा होगा। ऐतिहासिक महत्व कालीबंगा का ऐतिहासिक महत्व बहुआयामी और अत्यंत विशिष्ट है। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित होता है, क्योंकि यहाँ प्रारंभिक (Pre-Harappan) और परिपक्व (Mature Harappan) दोनों सांस्कृतिक स्तरों के प्रमाण एक ही स्थान पर प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार कालीबंगा सांस्कृतिक विकास की निरंतरता और संक्रमण की प्रक्रिया को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। कालीबंगा से प्राप्त हल से जोते गए खेत के अवशेष विश्व के प्राचीनतम कृषि-साक्ष्यों में गिने जाते हैं। यह खोज न केवल भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन कृषि परंपरा को प्रमाणित करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि यहाँ के निवासी वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध कृषि पद्धतियों से परिचित थे। इसी प्रकार दुर्ग क्षेत्र में पाई गई अग्निवेदियों की विशिष्ट संरचना धार्मिक जीवन के अध्ययन में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह स्थल को अन्य हड़प्पा नगरों से अलग पहचान प्रदान करती है। नगरीय योजना के संदर्भ में भी कालीबंगा का योगदान उल्लेखनीय है। यहाँ की ग्रिड-पद्धति पर आधारित सड़क व्यवस्था, प्राचीरों से सुरक्षित दुर्ग और निचले नगर का विभाजन, तथा सुव्यवस्थित जल-निकासी प्रणाली योजनाबद्ध शहरी जीवन के सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। यह दर्शाता है कि उस समय का समाज संगठित प्रशासन और सामाजिक अनुशासन से युक्त था। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कालीबंगा यह सिद्ध करता है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विस्तार केवल सिंध और पंजाब तक सीमित नहीं था, बल्कि वर्तमान राजस्थान क्षेत्र तक भी व्यापक रूप से फैला हुआ था। इस प्रकार कालीबंगा भारतीय प्राचीन इतिहास के अध्ययन में भौगोलिक विस्तार, सांस्कृतिक विविधता और सभ्यतागत विकास को समझने का एक प्रमुख आधार बनता है। निष्कर्ष कालीबंगा सभ्यता भारतीय प्राचीन इतिहास के अध्ययन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान रखती है। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता के व्यापक स्वरूप को समझने में महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करता है। यहाँ प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष यह स्पष्ट करते हैं कि कालीबंगा केवल एक साधारण बस्ती नहीं थी, बल्कि सुव्यवस्थित नगरीय जीवन, विकसित कृषि प्रणाली, संगठित सामाजिक संरचना और विशिष्ट धार्मिक परंपराओं से युक्त एक उन्नत नगर था। प्रारंभिक और परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के संयुक्त प्रमाण यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में सांस्कृतिक विकास क्रमिक और सतत रहा। हल से जोते गए खेत के अवशेष मानव सभ्यता के कृषि-इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ के निवासी वैज्ञानिक कृषि-पद्धतियों से परिचित थे। इसी प्रकार योजनाबद्ध सड़क-व्यवस्था, प्राचीरों से सुरक्षित दुर्ग-क्षेत्र और विकसित जल-निकासी प्रणाली इस तथ्य की पुष्टि करती है कि कालीबंगा में प्रशासनिक नियंत्रण और शहरी नियोजन का उच्च स्तर विद्यमान था। धार्मिक दृष्टि से अग्निवेदियों की विशिष्ट संरचना तथा सांस्कृतिक दृष्टि से मृण्मूर्तियों, मोहरों और आभूषणों की विविधता इस सभ्यता की आध्यात्मिक चेतना और कलात्मक अभिरुचि को उजागर करती है। यह स्थल इस धारणा को भी सुदृढ़ करता है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विस्तार व्यापक था और राजस्थान क्षेत्र उसमें एक सक्रिय और सशक्त भागीदार था। कालीबंगा का ऐतिहासिक अवलोकन यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय समाज पर्यावरण, तकनीक और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन पर आधारित था। यद्यपि प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण इस सभ्यता का पतन हुआ, तथापि इसके अवशेष आज भी उस युग की उन्नत जीवन-पद्धति का सजीव साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इसलिए कालीबंगा के संरक्षण, गहन अनुसंधान और नवीन वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से पुनः-अध्ययन की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिससे भारतीय प्राचीन इतिहास की और भी गूढ़ परतें उद्घाटित हो सकें। संदर्भ सूची (References) 1. बी. बी. लाल. द अर्लिएस्ट सिविलाइजेशन ऑफ साउथ एशिया. नई दिल्ली: 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| Keywords | . |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 17, Issue 1, January-June 2026 |
| Published On | 2026-03-05 |
| Cite This | कालीबंगा सभ्यता का ऐतिहासिक अवलोकन - Kamla Shanker Regar - IJAIDR Volume 17, Issue 1, January-June 2026. |
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