Journal of Advances in Developmental Research
E-ISSN: 0976-4844
•
Impact Factor: 9.71
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Volume 17 Issue 2
2026
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राजस्थान में 'ट्राइबल टूरिज्म' (Tribal Tourism) की संभावनाएं और इससे स्थानीय समुदायों की आय वृद्धि का विश्लेषण
| Author(s) | डॉ रमेश चंद मीना |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | राजस्थान वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, राजसी किलों और मरुस्थलीय जीवन के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि, राज्य का एक बड़ा हिस्सा—विशेष रूप से दक्षिणी अंचल (उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और बारां)—विशिष्ट जनजातीय संस्कृतियों (भील, मीणा, गरासिया, डामोर और सहरिया) से समृद्ध है, जो मुख्यधारा के पर्यटन परिदृश्य में अब तक आंशिक रूप से ही शामिल हो पाया है। प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य राजस्थान में 'ट्राइबल टूरिज्म' (जनजातीय पर्यटन) की अंतर्निहित संभावनाओं का मूल्यांकन करना और इसके माध्यम से स्थानीय जनजातीय समुदायों की आय वृद्धि तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है।यह शोध प्राथमिक सर्वेक्षण (N=400 घरेलू उत्तरदाता) और द्वितीयक आंकड़ों (राजस्थान पर्यटन विभाग की वार्षिक रिपोर्ट, सांख्यिकीय अमूर्त और नीति आयोग के संकेतकों) के मिश्रित गुणात्मक व मात्रात्मक दृष्टिकोण (Mixed-Method Approach) पर आधारित है। अध्ययन के निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि जनजातीय कला (पिथौरा, मांडणा), पारंपरिक नृत्य (गवरी, गैर, चरी), प्रामाणिक जीवन शैली और स्थानीय वनौषधि ज्ञान में पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार क्षमता है। 'होमस्टे' (Homestay) मॉडल और समुदाय-आधारित पर्यटन (Community-Based Tourism - CBT) के माध्यम से जनजातीय परिवारों की पूरक आय में औसतन 35-42% की वृद्धि दर्ज की जा सकती है, जिससे मौसमी पलायन में कमी आती है। हालांकि, बुनियादी अवसंरचना की कमी, संस्थागत ऋणों तक सीमित पहुंच और सांस्कृतिक व्यावसायीकरण का डर प्रमुख चुनौतियां हैं। यह पत्र 'जिम्मेदार और सतत जनजातीय पर्यटन' के लिए एक रणनीतिक नीतिगत ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। मुख्य शब्द (Keywords): ट्राइबल टूरिज्म, समुदाय-आधारित पर्यटन (CBT), आय वृद्धि, सतत विकास, सहरिया, भील, गरासिया विरासत प्रस्तावना (Introduction) वैचारिक पृष्ठभूमि और वैश्विक परिप्रेक्ष्य इक्कीसवीं सदी में वैश्विक पर्यटन उद्योग में एक बड़ा वैचारिक बदलाव देखा गया है। आधुनिक पर्यटक अब केवल विलासितापूर्ण और कंक्रीट के पर्यटक स्थलों तक सीमित रहने के बजाय प्रामाणिक, अनूठे और प्रकृति के करीब रहने वाले सांस्कृतिक अनुभवों की तलाश कर रहे हैं। इस प्रवृत्ति ने 'वैकल्पिक पर्यटन' (Alternative Tourism) को जन्म दिया है, जिसके अंतर्गत 'ट्राइबल टूरिज्म' (Tribal Tourism) या 'एथ्नो-टूरिज्म' (Ethno-Tourism) एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधा के रूप में उभरा है। जनजातीय पर्यटन से तात्पर्य एक ऐसी पर्यटन गतिविधि से है जिसमें पर्यटक स्वदेशी या जनजातीय समुदायों के आवासों में जाकर उनकी परंपराओं, कला, जीवन शैली, खान-पान और अनुष्ठानों को प्रत्यक्ष रूप से देखते और अनुभव करते हैं। वैश्विक स्तर पर अफ्रीका के मसाई (Maasai), ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिनल (Aboriginals) और अमेज़न बेसिन के स्वदेशी समुदायों ने पर्यटन को अपनी आजीविका का एक सफल साधन बनाया है। भारत में भी पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड का हॉर्नबिल उत्सव) और ओडिशा के जनजातीय अंचलों ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किए हैं। पर्यटन का यह मॉडल यदि व्यवस्थित और सतत तरीके से लागू किया जाए, तो यह न केवल सांस्कृतिक संरक्षण का माध्यम बनता है बल्कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि आजीविका (Non-farm Livelihoods) का एक सुदृढ़ विकल्प तैयार करता है। |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 17, Issue 1, January-June 2026 |
| Published On | 2026-01-07 |
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