Journal of Advances in Developmental Research

E-ISSN: 0976-4844     Impact Factor: 9.71

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समकालीन हिंदी कविता में मिथक और आलोचना तत्व: एक समीक्षात्मक अध्ययन

Author(s) डॉ. कविता सिंह
Country India
Abstract समकालीन हिंदी कविता ने भारतीय मिथकीय परंपरा को केवल सांस्कृतिक स्मृति या धार्मिक आस्था के रूप में स्वीकार नहीं किया है, बल्कि उसे वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय यथार्थ की आलोचनात्मक व्याख्या के प्रभावी उपकरण के रूप में पुनर्स्थापित किया है। आधुनिक हिंदी कवियों ने रामायण, महाभारत, पुराणों तथा लोक-मिथकों के पात्रों, प्रसंगों और प्रतीकों का सृजनात्मक पुनर्पाठ करते हुए सत्ता-संरचनाओं, सामाजिक असमानताओं, लैंगिक भेदभाव, जातिगत वर्चस्व, सांप्रदायिकता, उपभोक्तावाद तथा वैश्वीकरण से उत्पन्न मानवीय संकटों पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। इस प्रकार मिथक अतीत की स्थिर स्मृति न रहकर वर्तमान की वैचारिक एवं सांस्कृतिक समीक्षा का सशक्त माध्यम बन जाता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य समकालीन हिंदी कविता में मिथक के बहुआयामी स्वरूप तथा उसके अंतर्निहित आलोचनात्मक तत्वों का विश्लेषण करना है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि समकालीन कवि मिथकीय आख्यानों का यथावत् अनुकरण नहीं करते, बल्कि उन्हें नवीन सामाजिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित करते हुए उपेक्षित, हाशिये पर स्थित तथा मौन पात्रों को नई वैचारिक पहचान प्रदान करते हैं। विशेष रूप से स्त्रीवादी, दलित, लोकतांत्रिक तथा मानवीय दृष्टियों के आलोक में मिथकों का पुनर्पाठ समकालीन कविता को वैचारिक गहराई, सांस्कृतिक पुनर्समीक्षा और सामाजिक प्रासंगिकता प्रदान करता है। शोध में आलोचनात्मक एवं व्याख्यात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए प्रमुख समकालीन हिंदी कवियों की काव्य-दृष्टि का विश्लेषण किया गया है, जिससे यह स्थापित होता है कि मिथक आधुनिक जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन, वैचारिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण के प्रभावी साहित्यिक उपकरण के रूप में कार्य करता है। निष्कर्षतः, समकालीन हिंदी कविता में मिथक और आलोचना का संबंध परंपरा एवं आधुनिकता के सृजनात्मक संवाद का प्रतिनिधित्व करता है, जो हिंदी साहित्य की आलोचनात्मक चेतना को नई दिशा और व्यापक मानवीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
Keywords समकालीन हिंदी कविता, मिथक, मिथकीय पुनर्पाठ, आलोचनात्मक चेतना, साहित्यिक आलोचना, सांस्कृतिक विमर्श, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, सामाजिक यथार्थ, आधुनिक हिंदी साहित्य
Published In Volume 10, Issue 1, January-June 2019
Published On 2019-01-05
DOI https://doi.org/10.71097/IJAIDR.v10.i1.2095

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