Journal of Advances in Developmental Research

E-ISSN: 0976-4844     Impact Factor: 9.71

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फसल प्रतिरूप में परिवर्तन और सिंचाई के साधनों की भूमिका-एक अध्ययन

Author(s) मनमोहन मीना
Country India
Abstract भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ की विशाल जनसंख्या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। कृषि विकास की संरचना को समझने में फसल प्रतिरूप की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। फसल प्रतिरूप किसी क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, उनके अनुपात, क्षेत्रीय वितरण तथा फसल अनुक्रम को दर्शाता है। समय के साथ प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा तकनीकी परिवर्तनों के परिणामस्वरूप फसल प्रतिरूप में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं। इन परिवर्तनों में सिंचाई के साधनों की भूमिका सर्वाधिक निर्णायक रही है।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत में नहरों, बाँधों, कुओं, ट्यूबवेलों तथा हाल के वर्षों में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों जैसे ड्रिप एवं स्प्रिंकलर प्रणालियों के विकास ने कृषि को वर्षा-आधारित व्यवस्था से सिंचाई-आधारित व्यवस्था की ओर अग्रसर किया। इसके फलस्वरूप फसल सघनता में वृद्धि, फसल विविधीकरण तथा कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। जहाँ सिंचाई सुविधाएँ पर्याप्त हैं वहाँ धान, गेहूँ, गन्ना एवं नकदी फसलों का विस्तार हुआ, जबकि असिंचित एवं अल्प-सिंचित क्षेत्रों में मोटे अनाज, दलहन एवं तिलहन आज भी प्रमुख हैं।
यह शोध-पत्र फसल प्रतिरूप में परिवर्तन की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए सिंचाई के विभिन्न साधनों की भूमिका, उनके सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों तथा क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन करता है। साथ ही, यह अध्ययन सतत कृषि विकास के लिए संतुलित फसल प्रतिरूप, जल संरक्षण एवं विवेकपूर्ण सिंचाई प्रबंधन की आवश्यकता पर बल देता है।
मुख्य शब्द: फसल प्रतिरूप, सिंचाई साधन, कृषि विकास, जल संसाधन, सतत कृषि
प्रस्तावना (Introduction)
कृषि मानव सभ्यता की प्राचीनतम आर्थिक गतिविधि रही है और आज भी भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था का आधार है। भारत में कृषि केवल खाद्य आपूर्ति का साधन ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, रोजगार, सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। कृषि की प्रकृति, संरचना एवं विकास को समझने के लिए फसल प्रतिरूप का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही यह स्पष्ट करता है कि किसी क्षेत्र में किस प्रकार की फसलें उगाई जा रही हैं और उनके चयन के पीछे कौन-से कारक कार्य कर रहे हैं।
परंपरागत भारतीय कृषि मुख्यतः मानसून पर आधारित रही है। वर्षा की अनिश्चितता एवं असमान वितरण के कारण कृषि उत्पादन में अस्थिरता बनी रहती थी। इस समस्या से निपटने के लिए स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने सिंचाई को कृषि विकास का प्रमुख साधन माना। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से नहर परियोजनाओं, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं, कुओं एवं ट्यूबवेलों का व्यापक विस्तार किया गया। इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और देश खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना।
सिंचाई सुविधाओं के विकास ने किसानों को जोखिम उठाने, नई फसलें अपनाने तथा बहुफसली कृषि की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान किया। हरित क्रांति के पश्चात पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में गेहूँ एवं धान का प्रभुत्व बढ़ा, वहीं राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में नहरों और ट्यूबवेलों के आगमन से फसल प्रतिरूप में परिवर्तन देखने को मिला। इस प्रकार सिंचाई ने न केवल कृषि उत्पादन को प्रभावित किया, बल्कि क्षेत्रीय कृषि संरचना को भी पुनर्गठित किया।
हालाँकि सिंचाई आधारित कृषि ने अनेक सकारात्मक परिणाम दिए हैं, परंतु इसके साथ ही भूजल के अत्यधिक दोहन, मृदा लवणता, जल प्रदूषण एवं पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं। वर्तमान समय में जब जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, तब फसल प्रतिरूप में परिवर्तन और सिंचाई के साधनों की भूमिका का अध्ययन अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।

अध्ययन के उद्देश्य
1. फसल प्रतिरूप की अवधारणा एवं स्वरूप को स्पष्ट करना।
2. फसल प्रतिरूप में परिवर्तन के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करना।
3. भारत में प्रचलित सिंचाई के विभिन्न साधनों का अध्ययन करना।
4. सिंचाई के साधनों की भूमिका का फसल प्रतिरूप पर प्रभाव का मूल्यांकन करना।
5. सिंचाई आधारित कृषि से उत्पन्न समस्याओं एवं चुनौतियों की पहचान करना।
6. सतत कृषि विकास हेतु सुझाव प्रस्तुत करना।




शोध पद्धति
प्रस्तुत शोध-पत्र वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। अध्ययन में द्वितीयक आँकड़ों का उपयोग किया गया है, जिनमें पुस्तकों, शोध-पत्रों, सरकारी रिपोर्टों, कृषि जनगणना, नीति दस्तावेज़ों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (जैसे FAO, World Bank, ICAR) की रिपोर्टें सम्मिलित हैं।
शोध के अंतर्गत क्षेत्रीय एवं कालिक तुलनात्मक पद्धति अपनाई गई है, जिससे विभिन्न कालखंडों में फसल प्रतिरूप एवं सिंचाई साधनों में हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जा सके। प्राप्त तथ्यों का सारणीकरण कर उनका विश्लेषण किया गया है तथा तार्किक निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं।

साहित्य समीक्षा
कृषि भूगोल एवं संसाधन अध्ययन के क्षेत्र में फसल प्रतिरूप और सिंचाई के संबंध पर अनेक विद्वानों ने शोध कार्य किए हैं। शर्मा (2015) ने भारतीय कृषि भूगोल का विश्लेषण करते हुए बताया कि सिंचाई सुविधाओं के विस्तार ने भारत में फसल प्रतिरूप को अधिक सघन और विविध बनाया है। उनके अनुसार सिंचित क्षेत्रों में नकदी एवं जल-सघन फसलों का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
सिंह (2014) ने अपने अध्ययन में यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि सिंचाई न केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने का साधन है, बल्कि यह क्षेत्रीय कृषि संरचना को भी प्रभावित करती है। उन्होंने पंजाब और हरियाणा के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सिंचाई आधारित कृषि ने परंपरागत फसलों को पीछे छोड़ दिया है।
Hussain (2011) ने वैश्विक स्तर पर कृषि प्रतिरूप का अध्ययन करते हुए सिंचाई को कृषि विकास का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार, जहाँ सिंचाई सुविधाएँ सुलभ हैं वहाँ फसल सघनता अधिक होती है तथा कृषि जोखिम कम हो जाता है।
FAO (2017) की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि जल संसाधनों का असंतुलित उपयोग दीर्घकाल में कृषि एवं पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है। रिपोर्ट में सतत् सिंचाई प्रबंधन और जल संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है।
World Bank (2016) के अध्ययन में भारत में भूजल दोहन की समस्या को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सिंचाई आधारित फसल प्रतिरूप के कारण कई क्षेत्रों में भूजल स्तर चिंताजनक रूप से नीचे चला गया है।
उपरोक्त साहित्य समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि फसल प्रतिरूप में परिवर्तन और सिंचाई के साधनों के बीच गहरा संबंध है, परंतु अधिकांश अध्ययनों में क्षेत्रीय संतुलन और सतत् विकास के पहलुओं पर और अधिक शोध की आवश्यकता बताई गई है।
फसल प्रतिरूप की संकल्पना (Concept of Cropping Pattern)
फसल प्रतिरूप से तात्पर्य किसी निश्चित क्षेत्र में एक निश्चित समयावधि के दौरान उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार, उनके क्षेत्रफल, अनुपात तथा अनुक्रम से है। यह भूमि उपयोग, जल संसाधनों एवं कृषि नियोजन का महत्वपूर्ण आधार है। फसल प्रतिरूप का निर्धारण प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों प्रकार के कारकों से होता है।
फसल प्रतिरूप में फसल सघनता (Cropping Intensity) एवं फसल विविधता (Crop Diversity) का विशेष महत्व है। जहाँ जल एवं अन्य संसाधन पर्याप्त होते हैं वहाँ फसल सघनता अधिक होती है और किसान एक ही वर्ष में दो या तीन फसलें उगाते हैं।
फसल प्रतिरूप में परिवर्तन के कारण
प्राकृतिक कारक:
वर्षा की मात्रा एवं वितरण, तापमान तथा मृदा की प्रकृति फसल चयन को प्रभावित करते हैं।
आर्थिक कारक:
बाज़ार मूल्य, उत्पादन लागत, लाभ की संभावना एवं सरकारी समर्थन मूल्य (MSP) फसल प्रतिरूप को बदलते हैं।
तकनीकी कारक:
उन्नत बीज, उर्वरक, कृषि यंत्रीकरण एवं सिंचाई तकनीकों का विकास।
सामाजिक एवं संस्थागत कारक:
भूमि जोत का आकार, किसान की आर्थिक स्थिति एवं कृषि नीतियाँ।
सिंचाई के साधन: प्रकार एवं महत्व
सिंचाई का अर्थ प्राकृतिक वर्षा के अतिरिक्त कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों तक जल पहुँचाना है। भारत में सिंचाई के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं:
1. नहर सिंचाई : यह भारत में सिंचाई का एक प्रमुख स्रोत है, जो विशेष रूप से मैदानी भागों में प्रचलित है।
• प्रक्रिया: नदियों के जल को बैराज या बांध बनाकर नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता है।
• भौगोलिक वितरण: उत्तर भारत के विशाल मैदान (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश) और तटीय डेल्टा क्षेत्र। राजस्थान में 'इंदिरा गांधी नहर परियोजना' (IGNP) और 'गंग नहर' इसके प्रमुख उदाहरण हैं।


2. कुआँ एवं ट्यूबवेल सिंचाई: वर्तमान में यह भारत और राजस्थान में सिंचाई का सबसे बड़ा साधन है (कुल सिंचित क्षेत्र का 60% से अधिक)।
• प्रक्रिया: भू-गर्भिक जल को मानवीय श्रम (कुआँ) या विद्युत पंप (ट्यूबवेल) द्वारा सतह पर लाया जाता है।
• प्रकार:खुले कुएँ (Open Wells): कम गहरे, जल स्तर ऊँचा होने पर ही सफल। अब इनका चलन कम हो गया है। नलकूप (Tube Wells): अधिक गहरे (200-1000 फीट), मशीनीकृत और अधिक जल देने वाले।
3. तालाब एवं जलाशय : यह सिंचाई की सबसे प्राचीन विधि है।
प्रक्रिया: वर्षा जल को प्राकृतिक अवनमन (Depressions) या कृत्रिम बांध बनाकर रोका जाता है और फिर नालियों द्वारा खेतों में ले जाया ज 4. ड्रिप सिंचाई: इसे 'टपकन सिंचाई' भी कहा जाता है। यह जल संरक्षण की सबसे उन्नत तकनीक है (इजरायल तकनीक)।
. प्रक्रिया: इसमें प्लास्टिक के पाइपों का जाल बिछाया जाता है और पानी को बूंद-बूंद करके सीधे पौधे की जड़ों (Root Zone) में पहुँचाया जाता है। 5. स्प्रिंकलर सिंचाई: इसे 'फव्वारा सिंचाई' कहा जाता है।
प्रक्रिया: इसमें पंप द्वारा उच्च दबाव पर पानी को नोजल के माध्यम से हवा में फेंका जाता है, जो वर्षा की बूंदों की तरह फसल पर गिरता है।

फसल प्रतिरूप में सिंचाई की भूमिका
कृषि भूगोल में यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि "सिंचाई की सुविधा फसल चयन का सबसे बड़ा निर्धारक कारक है।" राजस्थान जैसे अर्ध-शुष्क प्रदेश में, जहाँ वर्षा अनिश्चित है, सिंचाई की उपलब्धता ने फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) को पूरी तरह बदल दिया है। भू-जल स्तर में गिरावट और फसल प्रतिरूप के बीच गहरा 'कार्य-कारण संबंध' (Cause-Effect Relationship) है।सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसल सघनता में वृद्धि हुई है। किसान अब वर्ष में दो या तीन फसलें उगाने लगे हैं। सिंचाई ने फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा दिया है, जिससे फल, सब्ज़ी एवं नकदी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ा है।

जल-गहन फसलों का चयन (Selection of Water-Intensive Crops)
सिंचाई की सुलभता ने किसानों को क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं को लांघने के लिए प्रेरित किया है।
• विरोधाभास: राजस्थान के मरुस्थलीय जिलों में भी अब चावल (हनुमानगढ़/बांसवाड़ा) और मूंगफली (बीकानेर/नागौर) उगाई जा रही है।
• उदाहरण: मूंगफली को 'राजस्थान का काजू' कहा जाता है, लेकिन इसे पकने के लिए 500-700 मिमी पानी की आवश्यकता होती है। नलकूपों के माध्यम से यह पानी पाताल से निकाला जा रहा है।

राजस्थान में फसल प्रतिरूप परिवर्तन: एक अध्ययन
राजस्थान एक शुष्क एवं अर्ध-शुष्क राज्य है जहाँ पारंपरिक रूप से बाजरा, ज्वार एवं दलहन उगाए जाते थे। इंदिरा गांधी नहर परियोजना के विकास से पश्चिमी राजस्थान में गेहूँ, सरसों एवं कपास की खेती संभव हुई। इससे कृषि उत्पादन एवं किसान की आय में वृद्धि हुई।
फसल प्रतिरूप परिवर्तन के कारक (Drivers of Change)
1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): सरकार द्वारा गेहूं और सरसों की खरीद सुनिश्चित करने के कारण किसान इन्हें प्राथमिकता देते हैं, भले ही इसके लिए गहरा बोरवेल क्यों न खुदवाना पड़े।
2. तकनीकी कारक: ट्रैक्टर, थ्रेशर और हार्वेस्टर के आने से खेती आसान हुई है। संकर बीजों (Hybrid Seeds) ने उत्पादन तो बढ़ाया है लेकिन पानी की मांग भी बढ़ा दी है।
3. बाजार की मांग: शहरी क्षेत्रों में सब्जियों और फलों की मांग बढ़ने से जयपुर और टोंक जैसे जिलों के आसपास 'ट्रक फार्मिंग' (सब्जी उत्पादन) का विकास हुआ है, जो पूर्णतः नलकूपों पर आश्रित है।
नीचे दी गई तालिका राजस्थान में प्रमुख फसलों के अंतर्गत क्षेत्रफल में आए बदलाव को दर्शाती है:
तालिका -1: राजस्थान में फसल क्षेत्रफल में बदलाव (लाख हेक्टेयर में)
फसल (Crop) 1990-91 (क्षेत्रफल) 2020-21 (क्षेत्रफल) प्रतिशत परिवर्तन भू-जल पर प्रभाव
बाजरा 48.5 42.1 कमी (-13%) सकारात्मक (कम पानी)
गेहूं 18.2 31.5 वृद्धि (+73%) अत्यधिक नकारात्मक
सरसों (Rapeseed) 24.1 28.6 वृद्धि (+18%) मध्यम
कपास 3.5 7.8 वृद्धि (+122%) नकारात्मक
दलहन (Pulses) 35.4 32.2 कमी सकारात्मक
(स्रोत: आर्थिक समीक्षा, राजस्थान सरकार & कृषि विभाग आँकड़े)

तालिका 2: फसल प्रतिरूप में बदलाव और जल खपत
फसल (Crop) जल की आवश्यकता (मिमी/हेक्टेयर) 2001 में सिंचित क्षेत्र (%) 2021 में सिंचित क्षेत्र (%) टिप्पणी
बाजरा/ज्वार (पारंपरिक) 300-400 45% 22% कम पानी की आवश्यकता
दलहन (दालें) 300-450 20% 15% गिरावट
गेहूं (Wheat) 450-650 15% 35% भारी वृद्धि (ट्यूबवेल आधारित)
मूंगफली (Groundnut) 500-700 5% 18% बीकानेर/नागौर में वृद्धि
जीरा/ईसबगोल 250-350 5% 10% नकदी फसल
स्रोत: कृषि विभाग, राजस्थान सरकार (कृषि सांख्यिकी रिपोर्ट).
विश्लेषण: कम पानी वाली फसलों (बाजरा) का स्थान अधिक पानी वाली फसलों (गेहूं, मूंगफली) ने ले लिया है। पश्चिमी राजस्थान में मूंगफली का उत्पादन भू-जल के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है।

आँकड़ा विश्लेषण एवं विवेचना
भारत में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ फसल प्रतिरूप में आए परिवर्तनों को विभिन्न आँकड़ों के माध्यम से समझा जा सकता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, स्वतंत्रता के समय भारत में कुल कृषि भूमि का लगभग 17 प्रतिशत ही सिंचित था, जबकि वर्तमान में यह अनुपात 45 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
सिंचित क्षेत्र के विस्तार के साथ गेहूँ और धान जैसी फसलों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उदाहरणस्वरूप, पंजाब और हरियाणा में कुल कृषि भूमि का 80 प्रतिशत से अधिक भाग सिंचित है, जहाँ गेहूँ-धान फसल चक्र प्रमुख है। इसके विपरीत, राजस्थान और महाराष्ट्र के शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई की सीमित उपलब्धता के कारण बाजरा, ज्वार और दलहन प्रमुख फसलें बनी हुई हैं। कृषि जनगणना के आँकड़े यह दर्शाते हैं कि जिन क्षेत्रों में ट्यूबवेल एवं नहर सिंचाई का विकास हुआ है, वहाँ फसल सघनता 150 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सिंचाई ने बहुफसली कृषि को प्रोत्साहित किया है।
हालाँकि आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि अत्यधिक सिंचाई वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर में निरंतर गिरावट आई है। उदाहरण के लिए, उत्तर-पश्चिम भारत के कई जिलों में भूजल स्तर प्रति वर्ष 0.5 से 1 मीटर तक गिर रहा है, जो दीर्घकाल में गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है।
इस प्रकार आँकड़ा विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि सिंचाई ने फसल प्रतिरूप को सघन एवं विविध बनाया है, परंतु इसके असंतुलित उपयोग से पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं।

समस्याएँ एवं चुनौतियाँ
जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन: यह समस्या मांग और आपूर्ति के बीच के भारी असंतुलन का परिणाम है। भौगोलिक भाषा में इसे 'जल खनन' (Mining of Water) कहा जाता है, जहाँ हम नवीकरणीय जल का नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से संचित 'जीवाश्म जल' (Fossil Water) का उपयोग कर रहे हैं।
क्षेत्रीय असमानता: भू-जल की उपलब्धता और संकट एक समान नहीं है; इसमें भारी 'स्थानिक भिन्नता' (Spatial Variation) पाई जाती है। यह असमानता दो स्तरों पर देखी जा सकती है:
भौगोलिक विषमता
सामाजिक-आर्थिक विषमता
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन ने जल चक्र (Hydrological Cycle) को बाधित कर दिया है, जिससे भू-जल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हुई है।


सुझाव एवं समाधान :
1. जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना : भौगोलिक दृष्टिकोण से, "वर्षा की प्रत्येक बूंद को उसी स्थान पर संग्रहित करना जहाँ वह गिरती है" (Catch the rain where it falls) सिद्धांत को अपनाना होगा।
2. सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहन : परंपरागत 'बाढ़ सिंचाई' (Flood Irrigation) या खुला पानी छोड़ने की पद्धति में जल की दक्षता (Water Use Efficiency) मात्र 35-40% होती है, जबकि शेष पानी वाष्पीकरण या रिसाव में व्यर्थ चला जाता है।
3. संतुलित फसल प्रतिरूप का विकास: वर्तमान जल संकट का मूल कारण क्षेत्र की 'कृषि-जलवायु परिस्थितियों' (Agro-climatic Conditions) के विपरीत फसलों का चयन है।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): किसानों को जल-गहन फसलों (जैसे- चावल, गन्ना, अधिक पानी वाला गेहूं) से कम पानी वाली फसलों (जैसे- बाजरा, ज्वार, रागी, सरसों, चना) की ओर स्थानांतरित करना होगा।
4. किसान प्रशिक्षण एवं जागरूकता : तकनीकी समाधान तब तक विफल रहेंगे जब तक कि व्यवहारिक परिवर्तन (Behavioral Change) न हो।
• जल साक्षरता (Water Literacy): 'कृषि विज्ञान केंद्रों' (KVKs) और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीणों को भू-जल की सीमितता और गिरते स्तर के दीर्घकालिक दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना।
• सहभागी जल प्रबंधन: 'अटल भू-जल योजना' की तर्ज पर ग्राम स्तर पर 'जल सुरक्षा योजना' (Water Security Plan) तैयार की जानी चाहिए, जिसमें स्थानीय समुदाय स्वयं तय करे कि उपलब्ध पानी का उपयोग कैसे करना है (Water Budgeting)।
• प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण: प्रगतिशील किसानों के खेतों पर प्रदर्शन (Demonstration) आयोजित कर यह सिद्ध करना कि कम पानी में भी खेती लाभदायक हो सकती है।
निष्कर्ष (Conclusion):
प्रस्तुत अध्ययन से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि फसल प्रतिरूप में परिवर्तन और सिंचाई के साधनों के बीच अत्यंत घनिष्ठ, प्रत्यक्ष तथा बहुआयामी संबंध है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ कृषि आज भी आजीविका का मुख्य साधन है, वहाँ सिंचाई सुविधाओं का विकास कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिंचाई के विस्तार ने कृषि को वर्षा की अनिश्चितता से काफी हद तक मुक्त किया है और किसानों को बहुफसली कृषि अपनाने के अवसर प्रदान किए हैं। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाएँ पर्याप्त रूप से विकसित हैं, वहाँ फसल सघनता अधिक है और किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी, बागवानी तथा उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाने में सक्षम हुए हैं। इससे न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है, बल्कि किसानों की आय में भी सुधार हुआ है। दूसरी ओर, असिंचित एवं अल्प-सिंचित क्षेत्रों में आज भी फसल प्रतिरूप सीमित है और कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर बनी हुई है।
हालाँकि सिंचाई आधारित फसल प्रतिरूप ने अनेक सकारात्मक परिणाम दिए हैं, परंतु इसके कुछ गंभीर नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं। अत्यधिक भूजल दोहन, मृदा लवणता, जल प्रदूषण तथा पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएँ आज भारतीय कृषि के समक्ष गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। विशेष रूप से गेहूँ–धान जैसे असंतुलित फसल चक्र ने कई क्षेत्रों में जल संकट को गहरा किया है।
अतः यह आवश्यक है कि फसल प्रतिरूप का विकास केवल उत्पादन वृद्धि के दृष्टिकोण से न होकर सतत् विकास के सिद्धांतों के अनुरूप किया जाए। इसके लिए क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार संतुलित फसल प्रतिरूप अपनाना, जल संरक्षण तकनीकों को प्रोत्साहित करना, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का विस्तार करना तथा किसानों को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। अंततः यह कहा जा सकता है कि यदि सिंचाई संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं वैज्ञानिक उपयोग किया जाए, तो फसल प्रतिरूप में सकारात्मक परिवर्तन लाकर भारतीय कृषि को दीर्घकालीन, टिकाऊ एवं समावेशी विकास की दिशा में अग्रसर किया जा सकता है।
संदर्भ सूची (References):
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Keywords .
Field Arts
Published In Volume 16, Issue 1, January-June 2025
Published On 2025-03-08
Cite This फसल प्रतिरूप में परिवर्तन और सिंचाई के साधनों की भूमिका-एक अध्ययन - मनमोहन मीना - IJAIDR Volume 16, Issue 1, January-June 2025.

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