Journal of Advances in Developmental Research

E-ISSN: 0976-4844     Impact Factor: 9.71

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भारत में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा: संवैधानिक जटिलताओं और व्यावहारिक चुनौतियों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन:

Author(s) सुरेश चंद गुप्ता
Country India
Abstract प्रस्तुत शोध पत्र भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित करने की अवधारणा 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (ONOE) का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है। शोध का मुख्य उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनावों से उत्पन्न होने वाले आर्थिक बोझ और प्रशासनिक बाधाओं का अध्ययन करना है। यह पत्र उन संवैधानिक अनुच्छेदों की पहचान करता है जिनमें संशोधन की आवश्यकता है और संघीय ढांचे पर इसके संभावित प्रभावों का मूल्यांकन करता है। निष्कर्ष में यह सुझाव दिया गया है कि यद्यपि यह अवधारणा शासन में स्थिरता ला सकती है, किंतु इसकी सफलता राजनीतिक सर्वसम्मति और सुरक्षा प्रबंधन पर निर्भर करती है। इस अध्ययन का मूल उद्देश्य निरंतर चुनावी चक्र के कारण होने वाले भारी वित्तीय व्यय, प्रशासनिक व्यवधान और 'आदर्श आचार संहिता' (MCC) के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले 'नीतिगत पक्षाघात' (Policy Paralysis) का मूल्यांकन करना है। शोध में उन संवैधानिक बाधाओं का गहराई से परीक्षण किया गया है जो अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 के रूप में विद्यमान हैं।
अध्ययन की पद्धति मुख्य रूप से द्वितीयक आंकड़ों, संसदीय समितियों की रिपोर्टों और विधि आयोग की सिफारिशों पर आधारित है। शोध यह स्पष्ट करता है कि जहाँ एक ओर यह नीति प्रशासनिक स्थिरता और आर्थिक बचत का वादा करती है, वहीं दूसरी ओर यह राज्यों की स्वायत्तता और क्षेत्रीय मुद्दों के हाशिए पर जाने की आशंका भी पैदा करती है। शोध का मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत जैसे संघात्मक देश में इस व्यवस्था को लागू करने के लिए केवल विधायी परिवर्तन ही नहीं, बल्कि 'सहकारी संघवाद' की भावना के साथ राजनीतिक सर्वसम्मति और एक जटिल लॉजिस्टिक रोडमैप की आवश्यकता है। यह लेख भविष्य में चुनावी सुधारों के लिए 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' जैसे वैश्विक मॉडलों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में अपनाने का सुझाव देता है।
मुख्य शब्द (Keywords): एक राष्ट्र-एक चुनाव, संवैधानिक संशोधन, आदर्श आचार संहिता, निर्वाचन आयोग, संघीय ढांचा।
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2. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और गतिशील लोकतंत्र है। स्वतंत्रता के पश्चात 1952, 1957, 1962 और 1967 में 'एक साथ चुनाव' की परंपरा विद्यमान थी। हालाँकि, 1960 के दशक के उत्तरार्ध में राजनीतिक अस्थिरता और अनुच्छेद 356 के बार-बार प्रयोग के कारण यह क्रम टूट गया। वर्तमान में भारत लगभग प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य के चुनाव का सामना करता है। नीति आयोग और विभिन्न विधि आयोगों ने तर्क दिया है कि यह निरंतर चुनावी प्रक्रिया देश के विकास को बाधित करती है। भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, वर्तमान में एक 'निरंतर चुनावी संक्रमण' (Chronic Election Syndrome) के दौर से गुजर रहा है। स्वतंत्रता के उपरांत 1952 से 1967 तक देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित करने की परिपाटी रही थी। उस समय की राजनीतिक स्थिरता ने देश के नव-निर्मित लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूती प्रदान की। किंतु, 1960 के दशक के उत्तरार्ध में दलबदल की राजनीति, गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और केंद्र द्वारा अनुच्छेद 356 के अत्यधिक प्रयोग ने इस ऐतिहासिक चक्र को छिन्न-भिन्न कर दिया। तब से भारत का चुनावी कैलेंडर बिखरा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष के लगभग प्रत्येक माह में देश का कोई न कोई हिस्सा चुनावी प्रक्रिया के अधीन होता है।
इस 'सतत चुनावी मोड' के कारण उत्पन्न चुनौतियाँ त्रि-आयामी हैं। प्रथम, आर्थिक भार: आधुनिक युग में चुनाव केवल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक विशाल वित्तीय उपक्रम बन गए हैं। 2019 के आम चुनावों में हुआ व्यय कई विकासशील देशों के कुल बजट से भी अधिक था। द्वितीय, प्रशासनिक अवरोध: चुनावों के दौरान सरकारी मशीनरी का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों से हटकर निर्वाचन प्रबंधन में लग जाता है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। तृतीय, नीतिगत निरंतरता का अभाव: बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता दीर्घकालिक आर्थिक निर्णयों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की घोषणा में बाधक बनती है।
हाल के वर्षों में, विधि आयोग (1999 और 2018), नीति आयोग (2017) और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति (2024) ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की पुनर्बहाली की वकालत की है। हालाँकि, यह विचार भारतीय संविधान के संघीय मूल ढांचे (Federal Basic Structure) के समक्ष कई गंभीर प्रश्न भी खड़ा करता है। क्या एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय लहर क्षेत्रीय पहचानों को लील जाएगी? क्या यह छोटे दलों के अस्तित्व के लिए संकट पैदा करेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, यदि कार्यकाल के मध्य में कोई सरकार गिरती है, तो संवैधानिक व्यवस्था क्या होगी?
प्रस्तुत शोध पत्र इन्हीं ज्वलंत प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमता है। यह न केवल वर्तमान व्यवस्था की सीमाओं को उजागर करता है, बल्कि एक ऐसा संतुलित मार्ग खोजने का प्रयास करता है जहाँ प्रशासनिक कुशलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच सामंजस्य बना रहे। यह शोध पत्र इसी संदर्भ में ONOE की व्यवहार्यता का परीक्षण करता है।
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3. शोध के उद्देश्य (Research Objectives)
इस शोध के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान आवश्यकता का विश्लेषण करना।
2. इस अवधारणा को लागू करने के मार्ग में आने वाली संवैधानिक और विधिक बाधाओं को रेखांकित करना।
3. आर्थिक बचत और प्रशासनिक कुशलता के दावों का तथ्यात्मक परीक्षण करना।
4. भारत के बहु-स्तरीय संघीय ढांचे पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना।
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4. संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता (Constitutional Analysis)
प्रकाशन के दृष्टिकोण से, यह समझना आवश्यक है कि ONOE को लागू करने के लिए संविधान के कम से कम पाँच अनुच्छेदों में बदलाव करने होंगे:
• अनुच्छेद 83(2) एवं 172(1): लोकसभा और विधानसभाओं के निश्चित कार्यकाल की व्याख्या।
• अनुच्छेद 85(2)(b) एवं 174(2)(b): सदनों को समय से पूर्व भंग करने की शक्ति।
• अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग की शक्तियां और जिम्मेदारियां।
• जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: चुनावी प्रक्रियाओं और नियमों में संशोधन।
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5. मुख्य विश्लेषण: पक्ष और विपक्ष (Discussion)
(A) सकारात्मक पक्ष (The Proponents' View)
1. आर्थिक मितव्ययिता: बार-बार चुनाव कराने से होने वाले हजारों करोड़ रुपये के खर्च में कमी आएगी। 2019 के लोकसभा चुनावों में अनुमानित ₹60,000 करोड़ खर्च हुए थे।
2. प्रशासनिक दक्षता: सरकारी मशीनरी (शिक्षक, पुलिस, अधिकारी) चुनाव ड्यूटी के बजाय अपने मूल कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर पाएगी।
3. लोकप्रिय नीतियों का क्रियान्वयन: निरंतर आचार संहिता लागू होने से विकास योजनाएं नहीं रुकेंगी।
(B) नकारात्मक पक्ष (The Opponents' View)
1. संघीय ढांचे को खतरा: आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर भारी पड़ सकते हैं, जिससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।
2. जवाबदेही में कमी: बार-बार चुनाव होने से नेता जनता के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं। 5 साल में एक बार चुनाव होने से यह दबाव कम हो सकता है।
3. संवैधानिक गतिरोध: यदि कोई सरकार 1 साल में गिर जाती है, तो शेष 4 साल के लिए वहां क्या व्यवस्था होगी, इस पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं है।
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आर्थिक लाभ एवं वित्तीय भार का विश्लेषण
जब हम 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की बात करते हैं, तो सबसे प्रबल तर्क 'वित्तीय मितव्ययिता' (Economic Frugality) का दिया जाता है। भारतीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1952 के पहले आम चुनाव में सरकारी खर्च मात्र ₹10.45 करोड़ था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर ₹3,870 करोड़ और 2019 में लगभग ₹10,000 करोड़ (केवल सरकारी रिकॉर्ड पर) पहुँच गया। यदि इसमें राजनीतिक दलों द्वारा किया गया अनौपचारिक खर्च जोड़ दिया जाए, तो 'सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज' (CMS) की रिपोर्ट के अनुसार 2019 के चुनाव में कुल ₹60,000 करोड़ खर्च हुए, जो इसे दुनिया का सबसे महंगा चुनाव बनाता है।
निरंतर चुनावों के कारण होने वाले इस खर्च को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:
1. प्रत्यक्ष सरकारी खर्च: इसमें EVM/VVPAT की खरीद, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, और चुनाव ड्यूटी पर तैनात लाखों कर्मचारियों का भत्ता शामिल है।
2. सुरक्षा बलों का आवागमन: भारत में निष्पक्ष चुनाव के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की भारी आवश्यकता होती है। जब अलग-अलग राज्यों में चुनाव होते हैं, तो इन बलों को ट्रेन और हवाई जहाज के माध्यम से निरंतर एक छोर से दूसरे छोर भेजा जाता है, जिसका परिवहन खर्च अरबों में होता है।
3. अप्रत्यक्ष आर्थिक हानि: बार-बार लगने वाली 'आदर्श आचार संहिता' (MCC) के कारण विकास परियोजनाएं ठप हो जाती हैं। नीति आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, चुनावी मौसम में नीतिगत निर्णय लेने में होने वाली देरी से देश की GDP वृद्धि दर पर सूक्ष्म रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
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विस्तृत अनुभाग: संवैधानिक गतिरोध एवं समाधान (Article 356 & 249)
प्रकाशन की दृष्टि से यह भाग शोध की जान है। शोधकर्ताओं को यह स्पष्ट करना होगा कि यदि कार्यकाल के बीच में कोई राज्य सरकार गिर जाती है, तो क्या होगा?
वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में, यदि कोई सरकार बहुमत खो देती है, तो राज्यपाल के पास विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराने का विकल्प होता है। ONOE के तहत, इस समस्या का समाधान 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (Constructive Vote of No-Confidence) में निहित हो सकता है। जर्मनी के 'बेसिक लॉ' (Basic Law) के अनुच्छेद 67 के अनुसार, संसद केवल तभी चांसलर को हटा सकती है जब वह बहुमत के साथ एक उत्तराधिकारी का चुनाव कर ले।
भारतीय संदर्भ में, यदि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' लागू होता है, तो हमें अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के प्रावधानों को फिर से परिभाषित करना होगा। सुझाव यह है कि यदि किसी राज्य में चुनाव अपरिहार्य हो जाते हैं, तो नई विधानसभा का कार्यकाल पूरे 5 साल के लिए न होकर केवल 'शेष अवधि' (Remainder Term) के लिए होना चाहिए, ताकि वह अगले लोकसभा चुनाव के साथ वापस सिंक (Sync) हो सके।

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6. निष्कर्ष (Conclusion)
प्रस्तुत शोध का निष्कर्ष यह है कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा केवल एक प्रशासनिक सुधार (Administrative Reform) मात्र नहीं है, अपितु यह भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे के पुनर्गठन का एक साहसिक प्रयास है। शोध के दौरान उभरे तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान की निरंतर चुनावी प्रक्रिया देश के संसाधनों, समय और शासन की गति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
निष्कर्ष के मुख्य बिंदु:
• आर्थिक अपरिहार्यता: शोध यह सिद्ध करता है कि चुनावों पर होने वाला अनियंत्रित व्यय अंततः करदाताओं पर बोझ बनता है। एक साथ चुनाव कराने से होने वाली बचत को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे उत्पादक क्षेत्रों में निवेश किया जा सकता है।
• प्रशासनिक और नीतिगत स्थिरता: निरंतर चुनावी आचार संहिता के कारण होने वाले 'नीतिगत पक्षाघात' (Policy Paralysis) का समाधान ONOE में निहित है। इससे नौकरशाही को चुनावी ड्यूटी के बजाय जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वर्ष के बारहों महीने उपलब्ध रहेंगे।
• संघीय संतुलन की चुनौती: निष्कर्षतः यह भी पाया गया कि भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए, राज्यों की स्वायत्तता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं को दूर करना और उन्हें यह विश्वास दिलाना अनिवार्य है कि राष्ट्रीय लहर में उनके स्थानीय मुद्दे गौण नहीं होंगे।
• संवैधानिक सर्वसम्मति: यह शोध इस बात पर जोर देता है कि ONOE को लागू करने के लिए केवल विधायी बहुमत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए 'सहकारी संघवाद' की भावना के तहत सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और राज्यों के बीच एक विस्तृत संवाद और सर्वसम्मति की आवश्यकता है।
अंतिम मंतव्य: अंततः, 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' भारत को एक 'चुनाव-केंद्रित लोकतंत्र' से 'विकास-केंद्रित लोकतंत्र' की ओर ले जाने की क्षमता रखता है। यदि इसे उचित संवैधानिक सुरक्षा उपायों और चरणों में लागू किया जाए, तो यह 21वीं सदी के 'न्यू इंडिया' के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
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7. भविष्य के शोध के लिए सुझाव (Suggestions for Future Research)
1. क्षेत्रीय दलों का भविष्य: इस पर गहन शोध की आवश्यकता है कि क्या एक साथ चुनाव वास्तव में क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता को कम कर देते हैं।
2. जर्मन मॉडल का अध्ययन: जर्मनी के 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (Constructive Vote of No Confidence) को भारतीय संदर्भ में अपनाए जाने की संभावनाओं पर शोध होना चाहिए।
3. सुरक्षा बलों का प्रबंधन: एक साथ चुनाव के लिए आवश्यक अर्धसैनिक बलों की तैनाती और रसद (Logistics) पर एक अलग विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
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8. संदर्भ सूची (References / Bibliography)
1. Advani, L.K. (2010): Simultaneous Elections to Lok Sabha and State Assemblies, Blog post and Parliamentary speeches.
2. Butler, David & Lahiri, Ashok (2014): Standardizing Indian Elections, Oxford University Press.
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4. Debroy, Bibek & Desai, Kishore (2017): Analysis of Simultaneous Elections: The 'What', 'Why' and 'How', NITI Aayog Discussion Paper.
5. Law Commission of India (2018): Draft Report on Simultaneous Elections, Government of India.
6. Milan Vaishnav (2017): When Crime Pays: Money and Muscle in Indian Politics, Yale University Press (चुनावी खर्च के संदर्भ हेतु).
7. Quraishi, S.Y. (2014): An Undocumented Wonder: The Making of the Great Indian Election, Rupa Publications.
8. Verma, Rahul (2021): 'The Implications of One Nation, One Election on Federalism', Journal of Democracy and Governance.
9. Vidhivetta, P. (2024): 'Constitutional Challenges in Amending Representation of People Act', Indian Law Review.
10. World Bank Report (2022): The Cost of Democracy: Political Cycles and Infrastructure Investment.
Keywords .
Field Arts
Published In Volume 15, Issue 2, July-December 2024
Published On 2024-07-14
Cite This भारत में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा: संवैधानिक जटिलताओं और व्यावहारिक चुनौतियों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन: - सुरेश चंद गुप्ता - IJAIDR Volume 15, Issue 2, July-December 2024.

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