Journal of Advances in Developmental Research
E-ISSN: 0976-4844
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Volume 17 Issue 1
2026
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जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और राजनीतिक दलों से तटस्थता : दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा का समालोचनात्मक विश्लेषण
| Author(s) | डॉ. राकेश कुमार जायसवाल |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीतिक चिंतन के उन विरल व्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने लोकतंत्र को केवल चुनाव और सत्ता-हस्तांतरण की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक-सामाजिक पुनर्निर्माण की व्यापक परियोजना के रूप में देखा। 1974 के बिहार छात्र आंदोलन और उसके बाद उभरे व्यापक जनांदोलन में उन्होंने ‘समग्र क्रांति’ का जो आह्वान किया, उसका केंद्रीय तत्व था राजनीतिक दलों की सत्ता-केंद्रित राजनीति के स्थान पर लोकशक्ति-आधारित, विकेंद्रीकृत और नैतिक राजनीति की स्थापना। इसी क्रम में उनकी ‘दलविहीन लोकतंत्र’ की अवधारणा सामने आती है, जिसे उन्होंने समय-समय पर ‘लोकनीति’, ‘लोकशक्ति’, ‘पंचायती स्वशासन’ और ‘सहमति-आधारित लोकतंत्र’ जैसे विचारों से जोड़ा। जेपी का मानना था कि आधुनिक दलीय राजनीति जनता को संगठित करने के बजाय उसे विभाजित करती है; चुनावी प्रतिस्पर्धा सिद्धांत और नीति से अधिक सत्ता, संसाधन, चंदा, प्रचार और गुटबंदी पर आधारित हो जाती है; और प्रतिनिधि संस्थाएँ नागरिकों की वास्तविक भागीदारी के बजाय कुछ पेशेवर राजनीतिक वर्गों के नियंत्रण में चली जाती हैं। यह शोधपत्र जेपी की दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा का समालोचनात्मक विश्लेषण करता है। इसमें प्रथम, उनके वैचारिक विकास—मार्क्सवाद, कांग्रेस सोशलिज्म, गांधीवाद और सर्वोदय—के बीच से दल-विरोधी रुझान के क्रमिक निर्माण को समझा गया है। द्वितीय, यह देखा गया है कि ‘समग्र क्रांति’ के नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयामों के बीच दलविहीन लोकतंत्र किस प्रकार एक केंद्रीय जोड़कारी अवधारणा के रूप में उपस्थित है। तृतीय, इस विचार की सैद्धांतिक शक्ति—जवाबदेही, विकेंद्रीकरण, नैतिकता, सहभागी लोकतंत्र, ग्राम स्वराज और संवादशील निर्णय-प्रक्रिया—का विश्लेषण किया गया है। चतुर्थ, आधुनिक प्रतिनिधिक लोकतंत्र, हित-समूहों की राजनीति, सामाजिक विषमता, बहुलतावाद, संगठनात्मक मध्यस्थता तथा उत्तरदायी शासन की आवश्यकताओं के संदर्भ में इसकी व्यावहारिक सीमाओं की आलोचनात्मक जांच की गई है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि जेपी का दलविहीन लोकतंत्र एक नैतिक-राजनीतिक आदर्श के रूप में अत्यंत आकर्षक है, क्योंकि यह लोकतंत्र को मात्र प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक परियोजना मानता है। किन्तु आधुनिक, जटिल, बहुलतावादी और बड़े पैमाने के समाज में पूरी तरह दलविहीन राजनीतिक व्यवस्था व्यवहारतः कठिन प्रतीत होती है। राजनीतिक दल हितों के समेकन, वैकल्पिक नीतियों के प्रस्तुतीकरण, नेतृत्व निर्माण और शासन की जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण माध्यम बने रहते हैं। इसके बावजूद, दलीय लोकतंत्र के अंतर्विरोधों—भ्रष्टाचार, अवसरवाद, नेतृत्व का व्यक्तिकेंद्रीकरण, चुनावी व्यय, जनसरोकारों से दूरी, और सत्ता-प्रधानता—पर जेपी की आलोचना आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। अतः शोधपत्र यह प्रतिपादित करता है कि जेपी की विरासत का उचित अर्थ पूर्ण दलविहीनता नहीं, बल्कि दलीय लोकतंत्र का लोकतंत्रीकरण, पारदर्शिता, आंतरिक लोकतंत्र, स्थानीय स्वशासन की सुदृढ़ता और लोक-आधारित नागरिक राजनीति का विस्तार है। |
| Keywords | समग्र क्रांति, दलविहीन लोकतंत्र, पार्टी-लेस डेमोक्रेसी, लोकनीति, सर्वोदय, जयप्रकाश नारायण, पंचायती राज, आपातकाल, सहभागी लोकतंत्र |
| Published In | Volume 11, Issue 2, July-December 2020 |
| Published On | 2020-12-06 |
| Cite This | जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और राजनीतिक दलों से तटस्थता : दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा का समालोचनात्मक विश्लेषण - डॉ. राकेश कुमार जायसवाल - IJAIDR Volume 11, Issue 2, July-December 2020. DOI 10.71097/IJAIDR.v11.i2.1841 |
| DOI | https://doi.org/10.71097/IJAIDR.v11.i2.1841 |
| Short DOI | https://doi.org/hbxcxp |
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10.71097/IJAIDR
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