Journal of Advances in Developmental Research
E-ISSN: 0976-4844
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Impact Factor: 9.71
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Volume 17 Issue 1
2026
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भारत में हरित नवाचार – वर्तमान रुझान और वि-कार्बनीकरण मार्ग
| Author(s) | भागवती, संदीप कुमार दर्जी |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | यह शोध पत्र भारत में हरित नवाचार (Green Innovation - GI) के वर्तमान रुझानों और रणनीतिक विकास का विश्लेषण करता है, जो देश के शुद्ध-शून्य 2070 के लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रतिबद्धता और तीव्र, सतत आर्थिक विकास की उसकी समानांतर खोज के संदर्भ में है। भारत की अनूठी विकासात्मक चुनौतियों के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकी की ओर एक लक्षित बदलाव की आवश्यकता है, जिससे GI जलवायु शमन और ऊर्जा सुरक्षा दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन जाता है। अध्ययन तीन मुख्य, गतिशील और तेज़ी से विकसित हो रहे GI क्षेत्रों की पहचान करता है, जो वि-कार्बनीकरण के मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं: अक्षय ऊर्जा और उन्नत ग्रिड समाधान: सौर पीवी और पवन ऊर्जा की बड़े पैमाने पर तैनाती, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) का प्रभावी एकीकरण, तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और IoT का उपयोग करके ग्रिड स्थिरता, ऊर्जा दक्षता, और मांग-पूर्वानुमान में सुधार।उद्योगों का लक्षित वि-कार्बनीकरण: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का कार्यान्वयन, जिसके तहत इलेक्ट्रोलाइज़र के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है और इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे कठिन-से-अपमानित (hard-to-abate) क्षेत्रों को जीवाश्म-मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है।सतत गतिशीलता: इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (EVs) में अभूतपूर्व वृद्धि, जो FAME जैसी सरकारी नीतियों, उन्नत चार्जिंग बुनियादी ढांचे, और बैटरी प्रौद्योगिकी में नवाचार द्वारा संचालित है। यह शोध पत्र निष्कर्ष निकालता है कि हरित नवाचार में वर्तमान रुझान भारत को एक वैश्विक "स्वच्छ प्रौद्योगिकी और नवाचार केंद्र" के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, इस सफलता को बनाए रखने के लिए वित्तीय बाजार की सीमाओं को दूर करना और सार्वजनिक-निजी जोखिम-साझेदारी तंत्रों के माध्यम से अनुसंधान और विकास (R&D) पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना तथा लक्ष्य-केंद्रित कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना आवश्यक होगा। मुख्य शब्द: हरित नवाचार, प्रौद्योगिकी, अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी 1.प्रस्तावना (Introduction ) भारत 21 वी सदी में जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और बढ़ती ऊर्जा मांग के संक्रमण अनिवार्य हो गया भारत में ग्लासगो Cop 26 सम्मेलन 2070 नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया। जिसके लिए पारंपरिक ऊर्जा ढांचे में बड़े पैमाने पर परिवर्तन आवश्यक है हरित नवाचार इस परिवर्तन की आधारशिला है क्योंकि यह निम्न कार्बन प्रौद्योगिकी, स्मार्ट ऊर्जा समाधान और सतत ऊर्जा विकास को संभव बनाता है। 2. साहित्यिक समीक्षा ( Literature Review) हरित नवाचार और वि-कार्बनीकरण से संबंधित साहित्य वैश्विक तथा राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र गति से विकसित हुआ है। विभिन्न अध्ययनों में यह स्वीकार किया गया है कि हरित नवाचार जलवायु परिवर्तन शमन, ऊर्जा सुरक्षा और सतत आर्थिक विकास का एक प्रमुख साधन है। IPCC (2021) की छठी आकलन रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के लिए ऊर्जा, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों में तीव्र विकार्बनीकरण आवश्यक है। रिपोर्ट में अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ प्रौद्योगिकी नवाचार को अनिवार्य समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नीति आयोग (2022) ने भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर अपने अध्ययन में यह दर्शाया कि EVs न केवल परिवहन क्षेत्र के उत्सर्जन को कम कर सकते हैं, बल्कि आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता भी घटाते हैं। अध्ययन में चार्जिंग अवसंरचना और बैटरी तकनीक को EV संक्रमण की प्रमुख चुनौती बताया गया है। भारत सरकार के Economic Survey (2022–23) में हरित विकास को “Growth with Sustainability” के रूप में परिभाषित किया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार अक्षय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण प्रणाली भारत के वि-कार्बनीकरण लक्ष्यों की रीढ़ हैं। MNRE (2023) द्वारा प्रकाशित National Green Hydrogen Mission दस्तावेज़ में यह रेखांकित किया गया है कि हरित हाइड्रोजन इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे कठिन-से-अपमानित (hard-to-abate) क्षेत्रों के लिए एक व्यवहारिक समाधान है। हालांकि, इसकी लागत और तकनीकी परिपक्वता अभी विकासशील अवस्था में है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि AI, IoT और डिजिटल ग्रिड समाधान ऊर्जा दक्षता को बढ़ाने में सहायक हैं, लेकिन विकासशील देशों में इनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर सीमित अध्ययन उपलब्ध हैं। इस प्रकार उपलब्ध साहित्य यह स्पष्ट करता है कि हरित नवाचार भारत के सतत विकास पथ में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है, किंतु इसके क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर और गहन अध्ययन की आवश्यकता है। शोध अंतराल ( Research gap) उपलब्ध साहित्य के विश्लेषण से निम्नलिखित प्रमुख शोध अंतराल सामने आते हैं: अधिकांश अध्ययन या तो नीति-आधारित हैं या प्रौद्योगिकी-केंद्रित, जबकि भारत के संदर्भ में हरित नवाचार के समग्र (integrated) प्रभाव—ऊर्जा, उद्योग और परिवहन को एक साथ जोड़कर—पर सीमित शोध उपलब्ध है। हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण और CCUS जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर सैद्धांतिक चर्चा तो है, किंतु इनके व्यावहारिक कार्यान्वयन और क्षेत्रीय असमानताओं पर पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। साहित्य में ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में हरित नवाचार के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों (रोजगार, आजीविका, ऊर्जा पहुँच) पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। अधिकांश वैश्विक अध्ययन विकसित देशों पर केंद्रित हैं, जबकि भारत जैसे विकासशील देश के लिए कम-लागत, समावेशी और स्थानीय नवाचार मॉडल पर शोध की कमी है। कौशल विकास, मानव संसाधन और हरित रोजगार (Green Jobs) को वि-कार्बनीकरण से जोड़कर देखने वाले अध्ययनों की संख्या सीमित है |
| Keywords | . |
| Published In | Volume 17, Issue 1, January-June 2026 |
| Published On | 2026-04-27 |
| Cite This | भारत में हरित नवाचार – वर्तमान रुझान और वि-कार्बनीकरण मार्ग - भागवती, संदीप कुमार दर्जी - IJAIDR Volume 17, Issue 1, January-June 2026. |
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10.71097/IJAIDR
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