Journal of Advances in Developmental Research
E-ISSN: 0976-4844
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Impact Factor: 9.71
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Volume 17 Issue 1
2026
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भारतीय कृषि में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और संपत्ति के अधिकारों के बीच का संघर्ष
| Author(s) | मनीराम मीना |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | भारतीय कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 75-80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, लेकिन भूमि तथा अन्य संपत्ति अधिकारों में गहरी असमानता बनी हुई है। यह स्थिति महिलाओं को मजदूर या सहायक के रूप में सीमित रखती है, जबकि वे खेती की मुख्य जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इस शोध पत्र में भागीदारी के आंकड़ों, कानूनी प्रावधानों, चुनौतियों, प्रभावों तथा समाधान पर विस्तृत चर्चा की गई है। यह संघर्ष केवल लैंगिक असमानता का नहीं, बल्कि कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास का भी है। मुख्य शब्द : लैंगिक असमानता, उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा, कानूनी प्रावधानों, कृषि कार्यबल परिचय : भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश है जहां कुल कार्यबल का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ी है। सांख्यिकी मंत्रालय के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2024 के अनुसार, ग्रामीण महिलाओं में कृषि में काम करने वाली महिलाओं का अनुपात 76.9 प्रतिशत है, जो 2022 के 75.9 प्रतिशत से बढ़ा है। वहीं ग्रामीण पुरुषों की भागीदारी घटकर 49.4 प्रतिशत रह गई है। कुल मिलाकर कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 64.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह प्रवृत्ति पुरुषों के गैर-कृषि क्षेत्रों की ओर पलायन के कारण हुई है। महिलाएं बुआई, निराई-गुड़ाई, कटाई, पशुपालन और फसल प्रबंधन जैसे कार्यों में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। फिर भी वे ज्यादातर अवैतनिक परिवार श्रमिक या कृषि मजदूर के रूप में काम करती हैं। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार केवल 12-14 प्रतिशत महिलाएं ही भूमि धारक हैं, जबकि वे ग्रामीण महिला श्रमिकों का 73 प्रतिशत हिस्सा हैं। यह “कृषि का स्त्रीकरण” (feminization of agriculture) अवसर के साथ चुनौती भी प्रस्तुत करता है। संपत्ति अधिकारों के अभाव में महिलाएं निर्णय लेने, ऋण प्राप्त करने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से वंचित रह जाती हैं। इस पत्र में इस द्वंद्व का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। साहित्य समीक्षा : विद्वानों ने इस विषय पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। प्रोफेसर बीना अग्रवाल ने अपनी पुस्तक A Field of One’s Own: Gender and Land Rights in South Asia तथा बाद के शोध पत्रों में महिलाओं के भूमि अधिकारों को सशक्तिकरण का आधार बताया है। उनके अनुसार भूमि स्वामित्व महिलाओं की परिवार के भीतर सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाता है और घरेलू हिंसा को कम करता है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) तथा विश्व बैंक की रिपोर्टों में भी महिलाओं के भूमि अधिकारों की कमी को उत्पादकता में 20-30 प्रतिशत की कमी से जोड़ा गया है। भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) तथा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़े दर्शाते हैं कि केवल 8-11 प्रतिशत महिलाओं के पास भूमि का स्वामित्व (एकाकी या संयुक्त) है। लैंडेसा तथा ऑक्सफैम जैसी संस्थाओं के अध्ययनों में सामाजिक मानदंडों, उत्तराधिकार प्रथाओं तथा राज्य स्तर के किरायेदारी कानूनों की कमियों को उजागर किया गया है। हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2004 के बावजूद कई राज्यों में महिलाएं भूमि से वंचित रहती हैं। इन अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि कानूनी समानता और वास्तविक क्रियान्वयन में बड़ा अंतर है। भारतीय कृषि में महिलाओं की भागीदारी: आंकड़े एवं रुझान ग्रामीण क्षेत्र: पीएलएफएस 2024 के अनुसार 76.9 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं कृषि में सक्रिय हैं। कुल आंकड़े: ग्रामीण भारत में 84 प्रतिशत महिलाएं आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। वे 33 प्रतिशत खेतिहर तथा 47 प्रतिशत कृषि मजदूर हैं। स्त्रीकरण की प्रवृत्ति: पुरुषों के शहरों या अन्य नौकरियों की ओर जाने से महिलाएं खेत प्रबंधन संभाल रही हैं, लेकिन निर्णय लेने की भूमिका सीमित है। राज्य-वार भिन्नता: दक्षिणी राज्य (तेलंगाना, तमिलनाडु) तथा उत्तर-पूर्वी राज्य बेहतर स्थिति में हैं, जबकि उत्तरी तथा पूर्वी राज्यों में स्थिति कमजोर है। महिलाएं मुख्य रूप से श्रम-प्रधान कार्यों (निराई, रोपाई, फसल कटाई) में सक्रिय हैं। पशुपालन तथा घरेलू उद्यान में उनकी भूमिका और भी अधिक है। यंत्रीकरण तथा नकदी फसलों में उनकी भागीदारी कम है। संपत्ति एवं भूमि अधिकारों का कानूनी ढांचा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में 2005 के संशोधन ने पुत्रियों को पुत्रों के समान संपत्ति अधिकार दिए। कृषि भूमि पर लागू धारा 4(2) को हटाया गया, जिससे पुत्रियों को जन्म से सह-उत्तराधिकारी अधिकार मिले। वन अधिकार अधिनियम 2006 में महिलाओं को संयुक्त स्वामित्व का प्रावधान है। कुछ राज्यों में महिलाओं के नाम पर पंजीकरण पर स्टांप ड्यूटी में छूट दी गई है। मुख्य समस्याएं: कई राज्यों (उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश) के किरायेदारी कानून अभी भी पुराने पितृसत्तात्मक हैं। महिलाएं मुख्यतः विधवा के रूप में भूमि प्राप्त करती हैं, पुत्री के रूप में नहीं। संयुक्त स्वामित्व अक्सर व्यावहारिक रूप से पुरुष नियंत्रण में रहता है। मुख्य संघर्ष एवं चुनौतियां क) भूमि स्वामित्व की कमी: महिलाएं कुल भूमि धारकों में मात्र 11-14 प्रतिशत हैं और कुल कृषि भूमि का केवल 11 प्रतिशत हिस्सा उनके पास है। उनके प्लॉट छोटे और कम उपजाऊ होते हैं। ख) आर्थिक बाधाएं: भूमि स्वामित्व न होने से किसान क्रेडिट कार्ड, पीएम-किसान सम्मान निधि, फसल बीमा तथा सब्सिडी जैसी योजनाओं से वंचित रहना पड़ता है। ऋण, बीज, उर्वरक तथा प्रौद्योगिकी तक पहुंच सीमित है। ग) सामाजिक-संस्कृतिक बाधाएं: पुत्र-प्राथमिकता तथा परिवार का दबाव। संपत्ति मांगने पर हिंसा या बहिष्कार का भय। कानूनी अधिकारों की जानकारी की कमी। घ) अन्य चुनौतियां: घरेलू कार्यों का दोहरा बोझ, कम मजदूरी, जलवायु परिवर्तन से अतिरिक्त जोखिम (क्षतिपूर्ति नहीं मिलना)। यह “काम करने वाली लेकिन मालिक न होने” वाली स्थिति विधवा, परित्यक्ता या परिवारिक विवाद में महिलाओं को पूरी तरह असुरक्षित बना देती है। इस संघर्ष के प्रभाव नकारात्मक प्रभाव: कृषि उत्पादकता में कमी। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण कमजोर। बच्चों के पोषण तथा शिक्षा पर प्रतिकूल असर। खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव। सकारात्मक संभावनाएं: भूमि स्वामित्व मिलने पर महिलाएं अधिक निवेश, बेहतर फसल चयन तथा घरेलू निर्णय लेने में सक्रिय होती हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि महिलाओं के पास भूमि होने पर परिवार की समृद्धि बढ़ती है। सरकारी योजनाएं एवं पहल महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (एमकेएसपी): महिलाओं को प्रशिक्षण तथा आजीविका समर्थन। कुछ राज्यों (ओडिशा, पश्चिम बंगाल) में सूक्ष्म प्लॉट आवंटन में महिलाओं के नाम पहले रखे जाते हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से सामूहिक भूमि पट्टा या खरीद। इन योजनाओं का दायरा अभी सीमित है और क्रियान्वयन में कमियां हैं। सिफारिशें : 1. सभी राज्यों में किरायेदारी कानूनों को 2005 के संशोधन के अनुरूप बनाना। 2. डिजिटल भूमि रिकॉर्ड में महिलाओं के नाम को अनिवार्य रूप से शामिल करना। 3. गांव स्तर पर जागरूकता अभियान तथा कानूनी सहायता केंद्र। 4. महिलाओं के सामूहिक खेती समूहों को ऋण तथा सहायता प्रदान करना। 5. नई भूमि आवंटन में संयुक्त या महिला-प्रथम स्वामित्व अनिवार्य करना। 6. लैंगिक-विश्लेषण वाले कृषि आंकड़ों का नियमित संकलन। 7. अनुसूचि:त जाति, जनजाति तथा पिछड़ी वर्ग की महिलाओं के लिए विशेष कार्यक्रम। निष्कर्ष: भारतीय कृषि का स्त्रीकरण एक वास्तविकता है। बढ़ती भागीदारी के बावजूद संपत्ति अधिकारों का अभाव महिलाओं को द्वितीय श्रेणी की किसान बना रहा है। कानूनी समानता को सामाजिक परिवर्तन, मजबूत क्रियान्वयन तथा नीतिगत इच्छाशक्ति से जोड़ना होगा। जब महिलाओं को पूर्ण किसान का दर्जा और अधिकार मिलेंगे, तभी कृषि क्षेत्र अधिक उत्पादक, समावेशी तथा जलवायु-लचीला बन सकेगा। यह न केवल लैंगिक न्याय बल्कि राष्ट्र के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। संदर्भ सूची : 1. सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2014 । 2. अग्रवाल, बीना (2015), “भारत में कितनी महिलाएं भूमि रखती हैं?”, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर। 3. जैन, सी. एवं अन्य (2013), “भारत में महिलाओं का भूमि स्वामित्व”, लैंड यूज पॉलिसी। 4. खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), जेंडर एंड लैंड राइट्स डेटाबेस। 5. कृषि जनगणना 2011-12, भारत सरकार। 6. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4, 2014-15 । 7. लैंडेसा संस्था, महिलाओं के भूमि अधिकार पर रिपोर्ट्स। 8. ऑक्सफैम इंडिया, महिला किसानों पर अध्ययन। 9. हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम, 2004 । 10. विश्व बैंक, भारतीय कृषि में महिलाएं रिपोर्ट। 11. परमार, वाई. (2023), “भारत में भूमि स्वामित्व में लैंगिक असमानता”। 12. महतो, आर.के. (2024), “भारत में भूमि स्वामित्व में लैंगिक असमानता”। 13. दुबोशे, एल. (2013), “जब महिलाएं भारत की भूमि जोतती हैं”, ऑक्सफैम। 14. सरकार, ए. (2016), “कृषि भूमि पर महिलाओं के अधिकार”। 15. नीति आयोग, ग्रामीण महिलाएं और कृषि क्रांति। 16. केलकर, डी.आर.जी. (2013), “महिलाएं और भूमि: हक का धुंधला परिदृश्य”। 17. आर्थिक सर्वेक्षण, विभिन्न वर्ष। 18. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, महिला किसान योजनाएं। 19. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय, विभिन्न रिपोर्ट्स। 20. संयुक्त राष्ट्र महिला, भूमि अधिकार रिपोर्ट। 21. कुंडू, पी. एवं अन्य, उत्तराधिकार सुधार पर अध्ययन। 22. साहा, के., भूमि स्वामित्व और निर्णय लेना। 23. डाउन टू अर्थ, भूमि अधिकार लेख। 24. पॉलिसी सर्कल, महिला भूमि अधिकार। 25. आईएमपीआरआई, कृषि सुधार में महिला अधिकार। 26. भारत सरकार, महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना दस्तावेज। 27. वन अधिकार अधिनियम 2006 । 28. एनएसएसओ एवं पीएलएफएस विभिन्न दौर। |
| Keywords | . |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 13, Issue 2, July-December 2022 |
| Published On | 2022-07-22 |
| Cite This | भारतीय कृषि में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और संपत्ति के अधिकारों के बीच का संघर्ष - मनीराम मीना - IJAIDR Volume 13, Issue 2, July-December 2022. |
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