Journal of Advances in Developmental Research

E-ISSN: 0976-4844     Impact Factor: 9.71

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र और भारत में समकालीन सार्वजनिक नीति

Author(s) श्योजी लाल बैरवा
Country India
Abstract यह शोध-पत्र कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्रतिपादित शासन, राजकोष, कराधान, प्रशासनिक निगरानी, लोककल्याण, विधि-व्यवस्था और राज्य-क्षमता के सिद्धांतों की तुलना भारत की समकालीन सार्वजनिक नीति से करता है। अध्ययन का प्रमुख तर्क यह है कि अर्थशास्त्र को न तो केवल कठोर शक्ति और गुप्तचर-व्यवस्था का ग्रंथ माना जाना चाहिए और न ही आधुनिक लोकतांत्रिक नीति के लिए प्रत्यक्ष नियम-पुस्तिका। यह एक व्यापक राज्य-विज्ञान है, जिसमें समृद्धि, सुरक्षा, प्रशासनिक अनुशासन और जनकल्याण को परस्पर निर्भर माना गया है। गुणात्मक पाठ-विश्लेषण तथा तुलनात्मक संस्थागत पद्धति के आधार पर शोध-पत्र सूचना का अधिकार अधिनियम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों, पंचायती राज, ई-शासन तथा राजकोषीय प्रबंधन जैसे क्षेत्रों की समीक्षा करता है। निष्कर्ष बताता है कि कौटिल्यीय दृष्टि राज्य-क्षमता, कर-संतुलन, अधिकारियों की जवाबदेही, जोखिम-प्रबंधन और सेवा-वितरण में विशेष रूप से प्रासंगिक है। किंतु निगरानी, दण्ड, सामाजिक पदानुक्रम और राजसत्तात्मक केंद्रीकरण से जुड़ी अवधारणाओं को भारत के संविधान, मौलिक अधिकारों, संघवाद, न्यायिक समीक्षा और नागरिक भागीदारी के अनुरूप गहराई से रूपांतरित करना आवश्यक है। अतः अर्थशास्त्र का उपयोग ऐतिहासिक ज्ञान-स्रोत और नीति-चिंतन की विश्लेषणात्मक परंपरा के रूप में किया जाना चाहिए, न कि शाब्दिक अनुकरण के रूप में।
Keywords कौटिल्य, अर्थशास्त्र, सार्वजनिक नीति, सुशासन, राज्य-क्षमता, जवाबदेही, भारत
Published In Volume 6, Issue 1, January-June 2015
Published On 2015-01-07
DOI https://doi.org/10.71097/IJAIDR.v6.i1.2099

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